कृष्ण और उद्धव संवाद(उद्धव जी की ब्रज यात्रा 01) ramanand sagar || shree...
कृष्ण और उद्धव संवाद(उद्धव जी की ब्रज यात्रा 01) ramanand sagar || shree krishna leela
उद्धव भागवत के अनुसार श्रीकृष्ण के प्रिय सखा और साक्षात बृहस्पति के शिष्य थे। महामतिमान उद्धव वृष्णिवंशीय यादवों के माननीय मन्त्री थे। उनके पिता का नाम 'उपंग' कहा गया है। कहीं-कहीं उन्हें वसुदेव के भाई 'देवभाग' का पुत्र कहा गया है, अत: उन्हें श्रीकृष्ण का चचेरा भाई भी बताया गया है। एक अन्य मत के अनुसार ये सत्यक के पुत्र और कृष्ण के मामा कहे गये हैं।
दान, व्रत, तपस्या, यज्ञ, जप, वेदाध्ययन, इन्द्रियसंयम और अन्य कई बार के पुण्यकर्मों द्वारा श्रीकृष्णचन्द्र की भक्ति ही प्राप्त की जाती है। भक्ति की प्राप्ति में ही इन सब साधनों की सफलता है। उद्धव जी साक्षात देवगुरु बृहस्पति के शिष्य थे। इनका शरीर श्रीकृष्णचन्द्र के समान ही श्यामवर्ण का था और नेत्र कमल के समान सुन्दर थे। ये नीति और तत्त्व-ज्ञान की मूति थे।
उद्धवजी वृष्णिवंशियों में एक प्रधान पुरुष थे। वे साक्षात् बृहस्पति जी के शिष्य और परम बुद्धिमान थे। वे भगवान् श्रीकृष्ण के प्यारे सखा तथा मंत्री भी थे। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त और एकान्तप्रेमी उद्धवजी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा। उद्ध व ! तुम व्रज में जाओ। वहां मेरे पिता-माता नंदबाबा और यशोदा मैया हैं, उन्हें आनन्दित करो; और गोपियां मेरे विरह की व्याधि से बहुत ही दुखी हो रही हैं, उन्हें मेरे संदेश सुनाकर उस वेदना से मुक्त करो। प्यारे उद्धव! गोपियों का मन नित्य-निरंतर मुझमें ही लगा रहता है। उनके प्राण, उनका जीवन, उनका सर्वस्व मैं ही हूं। मेरे लिये उन्होंने अपने पति-पुत्र आदि सभी सगे-संबंधियों को छोड़ दिया है। उन्होंने बुद्धि से भी मुझको अपना प्यारा, अपना प्रियतम-नहीं, नहीं; अपनी आत्मा मान रखा है। मेरा यह व्रत है कि जो लोग मेरे लिये लौकिक और पारलौकिक धर्मों को छोड़ देते हैं, उनका भरण-पोषण मैं स्वयं करता हूं। मैं उन गोपियों का परम प्रियतम हूं। मेरे यहां चले आने से वे मुझे दूरस्थ मानती हैं और मेरा स्मरण करके अत्यंत मोहित हो रही हैं, बार-बार मूच्र्छित हो जाती हैं। वे मेरे विरह की व्यथा से विह्वल हो रही हैं, प्रति क्षण मेरे लिये उत्कंठित रहती हैं। जब भगवान श्रीकृष्ण ने यह बात कही, तब उद्धवजी बड़े आदर से अपने स्वामी का संदेश लेकर रथ पर सवार हुए और नंदगांव के लिये चल पड़े। जब भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे अनुचर उद्धवजी व्रज में आये, तब उनसे मिलकर नंदबाबा बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने उद्ध वजी को गले लगाकर उनका वैसे ही सम्मान किया, मानो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आ गये हों। नंदबाबा का हृदय यों ही भगवान् श्रीकृष्ण के अनुराग-रंग में रंगा हुआ था। जब इस प्रकार वे उनकी लीलाओं का एक-एक करके स्मरण करने लगे, तब तो उनमें प्रेम की बाढ़ ही आ गयी, वे विह्वल हो गये और मिलने की अत्यंत उत्कंठा होने के कारण उनका गला रूंध गया। वे चुप हो गये। यशोदा रानी भी वहीं बैठकर नंदबाबा की बातें सुन रही थीं
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